Thursday, March 12, 2020

Yadon Ki Tokri / यादों की टोकरी - कपिल जैन

The Blurb / प्रस्तावना 


"आज उसकी आंखें जल्दी खुल गई, उठते ही वह छत पर चला गया ऐसा लगा जैसे उसने किसी दोस्त से मिलने की पहले से ही योजना बना रखी हो। मैं भी कुछ दबे पैरों से उसके पीछे चल पड़ा इस राज़ के सच को जानने। दुबकते पैरों के साथ साथ तेज भी चलना पड़ा, उसका भागना और मेरा चलना, दबाव मुझ पर ज्यादा था।
जब छत पर पहुंचा तो मैंने खुद को चकित पाया, चारों ओर पुरी छत के चक्कर लगा लिए मगर उसका वह दोस्त नज़र ही नहीं आया। फिर क्या था,मन में सवालों का समंदर उफान भरने लगा कि यह किससे मिलने आया है? इसकी तबीयत ठीक तो है ना ? एक बार के लिए लगा पुछ लेता हूं हालचाल। फिर मन के किसी हिस्से ने रूककर इंतजार करने को कहा। 

मैंने देखा वह सुरज से संवाद कर रहा था, वह पुछ रहा था कि ""किरण कहां है दिखाई नहीं दे रही, फिर बादलों में छिप गई क्या?"" ऐसा लगा जैसे सुरज ने पलट कर उत्तर दिया, ""हां वह इन दिनों बादल के काफी करीब आ गई है। वह उसमें उसी तरह घुल गई जैसे दूध में चीनी।"" मैंने संवादों के इस क्रम को देखकर चैन की सांस ली और अपने बच्चे व उसकी यारी पर गर्व करते हुए फिर से बिस्तर में आकर लेट गया। कुछ ऐसी ही कहानीयों का मिश्रण है- ""यादों की टोकरी" 

The Story / कहानी : 

ये किताब में लेखक कपिल जी ने बहुत ही सरल भाषा में समझाया है की उनका सफर कैसे रोचक रहा है और उनके सफर के अलग अलग पहलू को इस किताब में बताया है| उनका सफर शुरू हुआ है पहले पहलू "केदारनाथ" की यात्रा से जो कि उत्तराखंड की पहाड़ी पर हैं| वहाँ जाने के बाद वह अपने पॉव का दर्द भूल के हॅसते खेलते चलते जा रहे थे| 

कहानी के दूसरे पहलू में जहाँ कि "दादीजी का जनम दिन" इस दिन वह उपस्थिह नाह होने के बावजूद वह एक वीडियो कॉल करके उनकी दादीजी की खुसी देख के उन्हें अपना बचपना को याद कर रहा थे| 

कहानी के तीसरे पहलू में उन्होंने एक "मेहनती इंसान" जो उनका पडोसी भी है, उनकी जीवन दो पहियों के साथ कितने खुशी से बीत रहा था| जो की ३० साल पुराण उनकी साथी है| उनका साधारण जीवन उनका हौसला ये सब देखकर प्रेरणा काअहसास होता है|

कहानी के चौथा पहलू में लेखक कपिल जी ने "लेखन और जीवन" का वरण किया है| जिसमे वह ये बता रहे है कि, किस तरह वह उनकी कलम से बाते कर रहे है और उनकी कलम उनसे कुछ बातें पूछ रही है| उनमे से एक सवाल बहुत ही रोचक था जहा कलम पूछती है सफर की इस दौड़ में कही आप मुझे भूल तोह नै गये? 

कहानी के पाचवे पहलू में इन्होने "संवाद अपनों का" इसमे बताया है की कैसे वह जयपुर के लिएरवाना हुए, जहा वह बड़ी बेचैनी से अपनी माताजी और बेहेन से मिलने की लिए बेचैन हो रहे थे क्योंकि वह बहुत साल बाद मिलने वाले थे|

कहानी के छठा पहलू में इन्होने "ट्रैन का सफर" का जीकर किया है, जहा पे उनकी छोटी बहन उन्हें स्टेशन पे छोड़ने आयो थी|

वही दूसरी जगह वह अपने अंकलजी और दादाजी को होली के समय उनको बधाई दे कर एक छोटे से सफर पे जा रहे थे जयपुर और उन्हें अपनी संस्कृति का पूरा ज्ञान है, उन्होंने एक उदाहरण से व्यखित किया है|

उसी तरह की कुछ और किस्से है जो की कपिल जी की जिंदगी क बारे में है, "नुक्कड़ की कुल्फी", "खुद के करीब", "लक्षय", "हवा से यारी", "लुतफ", "सवादिस्ट जीवन", "आज़ाद होना क्या होता है", और "अंत नहीं आरम " ऐसे बहुत सी किस्से का ज़िकर हमारे प्रिय लेखक जी ने इस किताब में वधान किया है|

My Take / मेरे विचार : 

इस कहानी में लेखक कपिल जैन जी ने रोचक विषय पर बाते कि है, जिसका  वर्णन उन्होंने अपने बहुत की स्पष्ट शब्दों में लिखा है| इस कहानी में हर एक पहलू की अपनी एक कहानी है, साथ में उनकी कहानी भी है जिनमे उन्होंने सिर्फ अपने सफर के आलावा अपने परिवार की भी बाते की है, अपनी दिनचर्या की बाते हर एक लम्हो की बाते, और कुछ यादो कि बाते बतायी है जो कि कही नाह कही आपसे भी जुडी होगी|

इसमें एक ख़ास बात यह भी है कि ये आपको अपने आप से रु भ रु कर देगी, हसा देगी, रुला देगी, आपके चेहरे पर कही तो हसी होगी और कही आपकी आखो में नमी होगी और साथ साथ इस कहानी को पढ़ने से आपको खुशी का अहसास होगा। यह कहानी नहीं या बल्कि एक अवसर है जो आपको शायद बीती बाते याद दिला देगा जो कि आपकी ज़िन्दगी को बहुत हसीन पल का अहसास छोटे से चेहरे पर करवा देगा।

संपूर्ण किताब आपके दिल के लिए एक प्यारा तोफा जैसा है जीवन के छोटे मीठे और खूबसूरत घटनाये जो आपको रोमांचक सफर में ले जायेंगे। तो यहा क्लिक करिये और पढ़िए कपिल जैन दवरा लिखित एक ऐसी पुस्तक जो की यथार्थवादी और भावनाओ से भरी हुई है| 

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